अभी पिछले रविवार को टी.वी. पर एक फ़िल्म आ रही थी- 'अपरिचित- द स्ट्रेंजर'... बहुत अलग फ़िल्म थी. इस फ़िल्म का नायक अंबी (रामानुजम) पेशे से वकील रहता है. उसे उन लोगों से सख्त नफ़रत है, जो नियम तोड़ते हैं, रास्तों पर थूकते है, ट्राफ़िक जाम करते हैं, गरीबों और ज़रूरतमंदों की मदद नहीं करते, बस और ट्रेन में गंदगी और अश्लीलता फैलाते हैं. वह हमेशा हर नियम का पालन करता है, और लोगों को भी प्यार से ये सब करने के लिए समझाता है. उसकी सच्चाई को उसकी आधुनिक विचारों वाली प्रेमिका भी नहीं समझ पाती और उसे ठुकरा देती है...घरवाले भी उसे समझाते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, एक आदमी समाज को नहीं बदल सकता.
उसी दौरान वह एक वेबसाइट "अपरिचित.कॉम" के संपर्क में आता है. अपरिचित नाम का यह व्यक्ति धरती पर फैले अनाचार, अत्याचार और भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का बीड़ा उठाता है. यह दुनिया के सारे गुनहगारों को उनके गुनाहों के हिसाब से सज़ा देता है. अत्यंत क्रूर और भयावह पात्र है यह. इसी के साथ एक दूसरा पात्र भी प्रकाश में आता है- रेमो. अत्याधुनिक विचारों वाला, रईस और मॉर्डन लड़का. अंबी की प्रेमिका रेमो को पसंद करने लगती है.
धीरे-धीरे कहानी आगे बढती जाती है और इस राज़ पर से परदा उठता है कि अपरिचित और रेमो और कोई नहीं, बल्कि अंबी ही है. दरअसल अंबी मल्टीपल पर्सनालिटी डिसऑर्डर का मरीज़ है. एक ही सेकंड में वह अंबी बन जाता है, दूसरे ही सेकंड अपरिचित और अगले सेकंड रेमो...
ख़ैर, ये तो हुई फ़िल्म की बात.. रोज़मर्रा के जीवन में भी हममें से कितने लोग होंगे जो इस तरह का दोगला जीवन जीते होंगे...जिन बातों को हम हकीकत में नहीं कर पाते, उन्हें सिर्फ़ कल्पनाओं में सोचकर ही हमें कितनी तसल्ली मिल जाती है. कभी हम सोचते हैं कि अगर मैं राष्ट्रपति होता, तो शायद देश की हालत और अच्छी होती...या अगर मैं सचिन होता तो शायद और अच्छा खेलता. जाने कितनों का जीवन अपनी हम कल्पनाओं में ही जी लेते हैं. जिन चीज़ों के ख़िलाफ़ डटकर खड़े होने की हिम्मत नहीं (जैसे भ्रष्टाचार, झूठ, अनाचार, कामचोरी), उन्हें बस कोस कर ही अपने पिलपिले अहं की तुष्टि कर लेते हैं. हकीकत में इन सबका सामना हो जाने की कल्पना से भी डर लगता है. ग़लत को ग़लत बोलना बहुत हिम्मत का काम है... और हमारे पास कहाँ है इतनी हिम्मत!
अगर अंबी की तरह कोई सच में भी इन बुराइयों को सुधारने की इच्छा रखता हो, तो उस अकेले चने को भाड़ के आस-पास भी नहीं फटकने दिया जाता. हमारे यहाँ भीड़ का बोलबाला है, ऐकले चलने वालों का नहीं. लेकिन वही सीधा-सादा अंबी जब शक्तिशाली, क्रूर और निर्दयी बन जाता है, तब समाज के ठेकेदारों को अकल आती है. वही अंबी जब आज का लड़का रेमो बन जाता है, तो वही प्रेमिका उस पर फ़िदा हो जाती है, जिसने सच्चा प्यार करने वाले अंबी को दुत्कार दिया था.
समाज पता नहीं कौनसे चश्मे से सबको देखता है. निष्पाप लोगों को हमेशा क्यों सजा मिलती है, और पापियों का ही राज क्यों चलता है. कब तक हम कल्पनाओं में ही "अपरिचित" का अवतार बन कर लोगों को उनके गुनाहों की सजा देते रहेंगे??? अंबी बनें रहकर हम अपनी इच्छाएँ क्यों पूरी नहीं कर सकते??? अकेला चना भाड़ क्यों नहीं फोड़ सकता???
Thursday, May 1, 2008
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