Thursday, May 1, 2008

अपरिचित- द स्ट्रेंजर

अभी पिछले रविवार को टी.वी. पर एक फ़िल्म आ रही थी- 'अपरिचित- द स्ट्रेंजर'... बहुत अलग फ़िल्म थी. इस फ़िल्म का नायक अंबी (रामानुजम) पेशे से वकील रहता है. उसे उन लोगों से सख्त नफ़रत है, जो नियम तोड़ते हैं, रास्तों पर थूकते है, ट्राफ़िक जाम करते हैं, गरीबों और ज़रूरतमंदों की मदद नहीं करते, बस और ट्रेन में गंदगी और अश्लीलता फैलाते हैं. वह हमेशा हर नियम का पालन करता है, और लोगों को भी प्यार से ये सब करने के लिए समझाता है. उसकी सच्चाई को उसकी आधुनिक विचारों वाली प्रेमिका भी नहीं समझ पाती और उसे ठुकरा देती है...घरवाले भी उसे समझाते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, एक आदमी समाज को नहीं बदल सकता.

उसी दौरान वह एक वेबसाइट "अपरिचित.कॉम" के संपर्क में आता है. अपरिचित नाम का यह व्यक्ति धरती पर फैले अनाचार, अत्याचार और भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का बीड़ा उठाता है. यह दुनिया के सारे गुनहगारों को उनके गुनाहों के हिसाब से सज़ा देता है. अत्यंत क्रूर और भयावह पात्र है यह. इसी के साथ एक दूसरा पात्र भी प्रकाश में आता है- रेमो. अत्याधुनिक विचारों वाला, रईस और मॉर्डन लड़का. अंबी की प्रेमिका रेमो को पसंद करने लगती है.

धीरे-धीरे कहानी आगे बढती जाती है और इस राज़ पर से परदा उठता है कि अपरिचित और रेमो और कोई नहीं, बल्कि अंबी ही है. दरअसल अंबी मल्टीपल पर्सनालिटी डिसऑर्डर का मरीज़ है. एक ही सेकंड में वह अंबी बन जाता है, दूसरे ही सेकंड अपरिचित और अगले सेकंड रेमो...

ख़ैर, ये तो हुई फ़िल्म की बात.. रोज़मर्रा के जीवन में भी हममें से कितने लोग होंगे जो इस तरह का दोगला जीवन जीते होंगे...जिन बातों को हम हकीकत में नहीं कर पाते, उन्हें सिर्फ़ कल्पनाओं में सोचकर ही हमें कितनी तसल्ली मिल जाती है. कभी हम सोचते हैं कि अगर मैं राष्ट्रपति होता, तो शायद देश की हालत और अच्छी होती...या अगर मैं सचिन होता तो शायद और अच्छा खेलता. जाने कितनों का जीवन अपनी हम कल्पनाओं में ही जी लेते हैं. जिन चीज़ों के ख़िलाफ़ डटकर खड़े होने की हिम्मत नहीं (जैसे भ्रष्टाचार, झूठ, अनाचार, कामचोरी), उन्हें बस कोस कर ही अपने पिलपिले अहं की तुष्टि कर लेते हैं. हकीकत में इन सबका सामना हो जाने की कल्पना से भी डर लगता है. ग़लत को ग़लत बोलना बहुत हिम्मत का काम है... और हमारे पास कहाँ है इतनी हिम्मत!

अगर अंबी की तरह कोई सच में भी इन बुराइयों को सुधारने की इच्छा रखता हो, तो उस अकेले चने को भाड़ के आस-पास भी नहीं फटकने दिया जाता. हमारे यहाँ भीड़ का बोलबाला है, ऐकले चलने वालों का नहीं. लेकिन वही सीधा-सादा अंबी जब शक्तिशाली, क्रूर और निर्दयी बन जाता है, तब समाज के ठेकेदारों को अकल आती है. वही अंबी जब आज का लड़का रेमो बन जाता है, तो वही प्रेमिका उस पर फ़िदा हो जाती है, जिसने सच्चा प्यार करने वाले अंबी को दुत्कार दिया था.

समाज पता नहीं कौनसे चश्मे से सबको देखता है. निष्पाप लोगों को हमेशा क्यों सजा मिलती है, और पापियों का ही राज क्यों चलता है. कब तक हम कल्पनाओं में ही "अपरिचित" का अवतार बन कर लोगों को उनके गुनाहों की सजा देते रहेंगे??? अंबी बनें रहकर हम अपनी इच्छाएँ क्यों पूरी नहीं कर सकते??? अकेला चना भाड़ क्यों नहीं फोड़ सकता???

Wednesday, April 30, 2008

हर शाख़ पे उल्लू बैठा है


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


हमारी आँखों को आदत हो गई है अच्छाई को परेशान होता हुआ देखने की. याद करिए, पिछली बार आपने कब अच्छाई को जीतते हुए देखा था! थोड़ा मुश्किल से ही याद आएगा. अच्छाई और सच्चाई की ऐसी ही एक हार मैंने भी देखी है... 83 साल के अन्ना की आँखों में. अन्ना कोई भी हो सकते हैं. मेरे या आपके दादा, नाना या और कोई भी बुज़ुर्ग.
उस दिन अन्ना के साथ कोर्ट गई थी, पहली बार... पहली बार देखा कि सरकारी काम-काज कैसे होते हैं? एक अदना-सा बाबू भी आपको बड़ी आसानी-से दुत्कार देगा, यदि आपके पास उसके चाय-पानी के लिए पैसे नहीं हैं तो... धूप में खड़े रहने से चाहें आप चक्कर खाकर गिर जाएँ, वो आपकी फ़ाइल निकाल कर नहीं देगा....क्योंकि आपके पास उसे खिलाने के लिए ऊपर की कमाई नहीं है.
वकीलों की तो बात ही जाने दीजिए, वे बहुत बिज़ी हैं. उन्हें आपकी उम्र और आपकी तबीयत से क्या लेना-देना! प्रोफ़ेशन में ये सब नहीं देखा जाता. प्रोफेशनल होना, मानवीय होने से ज़्यादा जरूरी है. छोटी-छोटी चीज़ों के लिए आपको कई-कई किलोमीटर पैदल घुमाएँगे, और हो सकता है कि जब तक आपका काम हो, वे घर भी पहुँच चुके हों. उन्हें इससे क्या मतलब कि आप कितनी दूर से आए हैं, आप ने भी सुबह से कुछ नहीं खाया है.
ये बात सिर्फ़ एक दिन की नहीं है, अन्ना 26 साल से ये चीज़े देख रहे हैं. शायद उन्हें अब इन सबकी आदत हो गई है. जानते हैं उनका दोष क्या था??? अपनों पर आँख बंद करके विश्वास करना. पूरी दुनिया को अपनी ही तरह निष्पाप समझना. एक बहुत बड़े संस्थान के एक बहुत प्रतिष्ठित पद पर आसीन व्यक्ति को उनके ही अधीनस्थ ये नज़राना देंगे, उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा. उनके अधीनस्थों ने उन्हें एक झूठे केस में फँसा दिया. जीवन भर की ईमानदारी और मेहनत का अगर ये प्रतिफल मिले, तो फिर कोई अच्छे काम क्यों करे?
डायबीटिज़, साइटिका, वर्टिगो, कोरोनरी हार्ट डीसिज़, डिसलिपिडिमिया, और ऐसी और कई बीमारियों से अकेले जूझ रहे अन्ना को इन बीमारियों ने भी उतना नहीं तोड़ा, जितना अपनों के विश्वासघात ने तोड़ दिया है. क्या दुनिया यही है? 26 साल हो गये उन्हें शटल-कॉक की तरह वकीलों और कोर्ट के चक्कर लगाते हुए. कोई परिणाम नहीं. इन 26 सालों में उस इंसान की पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का क्या हुआ होगा, आप अंदाज़ा लगा सकते हैं. रुतबे वाले लोग तो सौ-सौ कत्ल कर के भी खुले घूमते है, और बिना कुछ किये, किसी और के गुनाहों की सज़ा भुगतने वाले ऐसे लोग जीवन भर न्याय का इंतज़ार करते रहते हैं.
ये तो सिर्फ़ एक उदाहरण है. ऐसे न जाने कितने अन्ना और होंगे हमारे समाज में, जो ईमानदारी और सच्चाई की सज़ा भुगत रहे होंगे. लेकिन उनकी आँखों में आज भी आशा की चमक दिखाई देती है. उन्हें आज भी भगवान और न्याय पर भरोसा है. उन्हें भरोसा है कि सच कभी हारेगा नहीं. ये उम्मीद ही मुझे और तकलीफ़ देती है. कोर्ट ने फिर चार महीने बाद की तारीख़ दी है...ख़ैर.... वो सुबह कभी तो आएगी.