
हमारी आँखों को आदत हो गई है अच्छाई को परेशान होता हुआ देखने की. याद करिए, पिछली बार आपने कब अच्छाई को जीतते हुए देखा था! थोड़ा मुश्किल से ही याद आएगा. अच्छाई और सच्चाई की ऐसी ही एक हार मैंने भी देखी है... 83 साल के अन्ना की आँखों में. अन्ना कोई भी हो सकते हैं. मेरे या आपके दादा, नाना या और कोई भी बुज़ुर्ग.
उस दिन अन्ना के साथ कोर्ट गई थी, पहली बार... पहली बार देखा कि सरकारी काम-काज कैसे होते हैं? एक अदना-सा बाबू भी आपको बड़ी आसानी-से दुत्कार देगा, यदि आपके पास उसके चाय-पानी के लिए पैसे नहीं हैं तो... धूप में खड़े रहने से चाहें आप चक्कर खाकर गिर जाएँ, वो आपकी फ़ाइल निकाल कर नहीं देगा....क्योंकि आपके पास उसे खिलाने के लिए ऊपर की कमाई नहीं है.
वकीलों की तो बात ही जाने दीजिए, वे बहुत बिज़ी हैं. उन्हें आपकी उम्र और आपकी तबीयत से क्या लेना-देना! प्रोफ़ेशन में ये सब नहीं देखा जाता. प्रोफेशनल होना, मानवीय होने से ज़्यादा जरूरी है. छोटी-छोटी चीज़ों के लिए आपको कई-कई किलोमीटर पैदल घुमाएँगे, और हो सकता है कि जब तक आपका काम हो, वे घर भी पहुँच चुके हों. उन्हें इससे क्या मतलब कि आप कितनी दूर से आए हैं, आप ने भी सुबह से कुछ नहीं खाया है.
ये बात सिर्फ़ एक दिन की नहीं है, अन्ना 26 साल से ये चीज़े देख रहे हैं. शायद उन्हें अब इन सबकी आदत हो गई है. जानते हैं उनका दोष क्या था??? अपनों पर आँख बंद करके विश्वास करना. पूरी दुनिया को अपनी ही तरह निष्पाप समझना. एक बहुत बड़े संस्थान के एक बहुत प्रतिष्ठित पद पर आसीन व्यक्ति को उनके ही अधीनस्थ ये नज़राना देंगे, उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा. उनके अधीनस्थों ने उन्हें एक झूठे केस में फँसा दिया. जीवन भर की ईमानदारी और मेहनत का अगर ये प्रतिफल मिले, तो फिर कोई अच्छे काम क्यों करे?
डायबीटिज़, साइटिका, वर्टिगो, कोरोनरी हार्ट डीसिज़, डिसलिपिडिमिया, और ऐसी और कई बीमारियों से अकेले जूझ रहे अन्ना को इन बीमारियों ने भी उतना नहीं तोड़ा, जितना अपनों के विश्वासघात ने तोड़ दिया है. क्या दुनिया यही है? 26 साल हो गये उन्हें शटल-कॉक की तरह वकीलों और कोर्ट के चक्कर लगाते हुए. कोई परिणाम नहीं. इन 26 सालों में उस इंसान की पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का क्या हुआ होगा, आप अंदाज़ा लगा सकते हैं. रुतबे वाले लोग तो सौ-सौ कत्ल कर के भी खुले घूमते है, और बिना कुछ किये, किसी और के गुनाहों की सज़ा भुगतने वाले ऐसे लोग जीवन भर न्याय का इंतज़ार करते रहते हैं.
ये तो सिर्फ़ एक उदाहरण है. ऐसे न जाने कितने अन्ना और होंगे हमारे समाज में, जो ईमानदारी और सच्चाई की सज़ा भुगत रहे होंगे. लेकिन उनकी आँखों में आज भी आशा की चमक दिखाई देती है. उन्हें आज भी भगवान और न्याय पर भरोसा है. उन्हें भरोसा है कि सच कभी हारेगा नहीं. ये उम्मीद ही मुझे और तकलीफ़ देती है. कोर्ट ने फिर चार महीने बाद की तारीख़ दी है...ख़ैर.... वो सुबह कभी तो आएगी.

3 comments:
वो सुबह कभी तो आएगी.- आमीन!
आमीन!!!
फोन्ट जरा बढ़ा दें. उम्र का अहसास बेहतर हो जायेगा-हमें भी..और अनूप शुक्ल जी को भी/// शायद ज्ञान जी को सचमुच -प्रमोद सिंग के साथ. :)
वो सुबह कभी तो आयेगी...अन्ना जैसे लोगो ने ही इंसानियत को कही किसी कोने मे जिंदा रखा है ओर ईश्वर नाम की उस हस्ती को भी....जिसके होने पर कई बार सवाल उठे है.
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